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1.3 पुनर्जागरण के मुख्य कारण

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1.  क्रूसेड युद्धों का प्रभाव ( 11 वीं –13 वीं शताब्दी ) :  

•  ईसाई और मुस्लिम शासकों के बीच हुए इन धार्मिक युद्धों के माध्यम से यूरोपीय समाज को अरबी यूनानी और फारसी ज्ञान परंपराओं का परिचय हुआ।  
•  गणित ( जैसे दशमलव पद्धति ),  चिकित्सा ( इब्नसिना ),  ज्योतिष दर्शन और तर्कशास्त्र जैसी विषय वस्तुएँ यूरोप में पहुँचीं।  
•  यह संपर्क विज्ञान और तर्क आधारित सोच की पृष्ठभूमि तैयार करता है।

2.  कुस्तुंतुनिया का पतन (1453):  

•  ऑटोमन तुर्कों द्वारा बाइज़ैंटाइन साम्राज्य की राजधानी कुस्तुंतुनिया पर विजय के बाद अनेक यूनानी विद्वान इटली व पश्चिमी यूरोप की ओर पलायन कर गए।  
•  वे अपने साथ प्राचीन यूनानी रोमन पांडुलिपियाँ शास्त्र कला व दर्शन की धरोहर लेकर आए।  
•  इटली के विद्वान अबइन ग्रंथों का लैटिन और स्थानीय भाषाओं में अनुवाद करने लगे।

3.  इटली की अनुकूल भौगोलिक स्थिति :  

•  इटली , यूरोप एशिया और उत्तरी अफ्रीका को जोड़ने वाले प्राचीन व्यापार मार्गों पर स्थितथा।  
•  समुद्री व्यापार ( विशेषतः वेनिस जेनोआ फ्लोरेंस से आर्थिक समृद्धि हुई जिससे कला वास्तु और शिक्षा में निवेश संभव हुआ।  
•  व्यापारियों के माध्यम से अरब व प्राचीन ज्ञान परंपरा का प्रवेश आसान हुआ।

4.  संरक्षक वर्ग की भूमिका –  मेडिची परिवार :  

•  फ्लोरेंस का मेडिची परिवार एक शक्तिशाली बैंकर और राजनैतिक संरक्षक वर्ग था।  
•  उन्होंने चित्रकारों ( बोटिचेली ),  वास्तुविदों ( ब्रूनेलेस्की ),  वैज्ञानिकों और विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया।  
•  इसने एक ऐसी संस्कृति को जन्म दिया जिस में कलात्मक स्वतंत्रता और बौद्धिक अनुसंधान को समर्थन मिला।

5.  छापे खाने का आविष्कार (1455):  

            •  जो हान्स गुटेन बर्ग ने जर्मनी में मुद्रणकला का विकास किया जिससे ज्ञान का जन सामान्य तक प्रसार संभव हुआ।  
            •  बाइबिल   और क्लासि की ग्रंथों की प्रतियाँ अब बड़े पैमाने पर उपलब्ध होने लगीं।  
            •  इसने साक्षरता दर बढ़ाई आलोचनात्मक दृष्टिकोण विकसित किया और चर्च की एकाधिकारिता को चुनौती दी।

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